जय दुबाशी का यह आलेख मूल रूप से इंडिया टुडे मैगजीन के 31 दिसंबर, 1978 के अंक में प्रकाशित हुआ था )
एक समय था जब बंगाल में हेस्टिंग्स से पहले की ज़मींदारी व्यवस्था या लॉर्ड क्लाइव के दौर में तमिलनाडु के नादरों पर शोध करने के लिए भारतीय विद्वान ऑक्सफोर्ड के बैलियोल कॉलेज या लंदन के व्हाइटहॉल स्थित इंडिया हाउस लाइब्रेरी जाया करते थे. अब यह प्रवाह उलट गया है. विदेशी शोधकर्ता भारत आकर भारतीय स्रोतों का अध्ययन कर रहे हैं.
ए.आर.एच. कोपले की पुस्तक “द पॉलिटिकल करियर ऑफ सी. राजगोपालाचारी (The Political Career Of C. Rajagopalachari )” इसी बदलती प्रवृत्ति का उदाहरण है. इंग्लैंड के केंट विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाने वाले कोपले ने भारतीय स्रोतों को निकट से समझने के लिए भारत में दो साल बिताए. वे खुद को एक सेल्फ टॉट (स्व-शिक्षित) इतिहासकार बताते हैं और यह बात उनके लेखन में सकारात्मक रूप से दिखती भी है. उनका अंदाज उन प्रचलित एंग्लो-इंडियन क्लिशे (घिसे-पिटे मुहावरों) से मुक्त है, जिनके सहारे कई ब्रिटिश लेखक भारत और पूर्व के बारे में अक्सर तिरस्कार भरे ढंग से लिखते रहे हैं.
कोपले की शैली उनके विषय- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (सीआर)- के लिहाज से बिलकुल मुफीद बैठती है. सीआर एक प्रभावशाली व्यक्तित्व थे, जिनका नाम अंग्रेज़ी वर्णमाला जितना लंबा और स्वभाव उतना ही जटिल था. हालांकि यह पुस्तक उनके राजनीतिक जीवन का अध्ययन है, न कि उनके व्यक्तिगत चरित्र का.
भारत और शायद पूरी दुनिया में ही किसी व्यक्ति का जो निजी जीवन होता है, वही आगे चलकर उसकी सार्वजनिक छवि में बदलता है. जैसे महात्मा गांधी को उस युवा से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता, जो अपने पिता के अंतिम समय में भी अपने दांपत्य जीवन में व्यस्त था; उसी तरह मोरारजी देसाई को भी उनके पिता की आत्महत्या या 1953 में उनकी बेटी की आत्महत्या जैसी त्रासदियों से अलग नहीं किया जा सकता. व्यक्ति का निजी अनुभव ही बाद के उसके व्यक्तित्व को आकार देता है.
कोपले ने सीआर के प्रारंभिक जीवन की लगभग अनदेखी की है. वे यह नहीं बताते कि उनका जन्म कब हुआ, विवाह कब हुआ, उनके कितने बच्चे थे, और न ही यह स्पष्ट करते हैं कि दक्षिण के सेलम का एक साधारण वकील कैसे गांधी का इतना करीबी सहयोगी बना. कोपले ने सीआर के राजनीतिक जीवन को तीन परस्पर जुड़ी धाराओं में बांटकर विश्लेषित किया है. पहली- सत्ता की राजनीति, जिसमें उनका टकराव कांग्रेस और ब्रिटिश राज दोनों से हुआ. दूसरी- जातिवाद और सांप्रदायिक राजनीति, जो आखिरकार उनके राजनीतिक पतन का कारण बनी. और तीसरी- सिद्धांतों की राजनीति, जिसमें उनके सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक विश्वास शामिल थे. जीवन के अंतिम चरण में इन्हीं सिद्धांतों ने उन्हें सत्तारूढ़ कांग्रेस, विशेषकर नेहरू से अलग कर दिया.
इन तीनों पहलुओं पर कोपले ने अलग-अलग अध्याय लिखे हैं और इस क्रम में आंबेडकर, जिन्ना से लेकर लंदन के स्टैफर्ड क्रिप्स और एटली जैसे नेताओं के साथ सीआर के संबंधों पर प्रकाश डाला है. यह पुस्तक का शायद सबसे सशक्त हिस्सा है, क्योंकि सीआर एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय थे. वे जिस भी मुद्दे में उतरते, उसमें पूरी तरह डूब जाते. कई बार तो लगता है कि शायद उन्हें स्वयं भी पता नहीं होता था कि वे परिस्थितियों से संचालित हो रहे हैं या परिस्थितियों को खुद संचालित कर रहे हैं.
सीआर के राजनीतिक जीवन की विडंबना यह रही कि वे जिन लक्ष्यों को साधना चाहते थे, उनमें से अधिकांश में सफल नहीं हुए. वे नेहरू या पटेल जैसी प्रतिष्ठा नहीं पा सके, जबकि वे पारिवारिक संबंध होने के कारण उन दोनों के मुकाबले गांधी के ज्यादा करीब थे. आंबेडकर, जयकर, सावरकर जैसे नेता उन पर भरोसा नहीं करते थे; जिन्ना और ब्रिटिश हुकूमत भी उन्हें संदेह की दृष्टि से देखती थी. यहां तक कि गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई ने भी एक बार कहा था कि “सीआर ने क्रिप्स से अपनी बातचीत की रिपोर्ट तो दी है, पर वास्तव में उनके बीच क्या हुआ, यह हम नहीं जानते.”
जयकर ने सप्रू को पत्र लिखकर सचेत किया था कि “उस व्यक्ति पर भरोसा मत करना, क्योंकि मुझे समझ नहीं आता कि उसकी चाल क्या है.” सीआर के संपर्क में आने वाला लगभग हर व्यक्ति यह आशंका जताता था कि वे किसी न किसी दूसरी ही करामात में लगे हैं. 1942 के आंदोलन के चरम पर उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी, लेकिन ब्रिटिश भी उन पर भरोसा नहीं कर सके. वायसराय लिनलिथगो ने तो उनसे मिलने तक से इनकार कर दिया और लंदन में अमेरी से कहा कि “सीआर एक बड़ी मुसीबत रहे हैं.”
कोपले ने सीआर को राजनीति में नैतिकतावादी बताया है, जो पूरी तरह सटीक नहीं लगता. वास्तव में उनका स्वभाव एक पुरोहित जैसा था, बस उनके देवता समय-समय पर बदलते रहे- कभी गांधी, फिर जिन्ना, और आखिरकार निजी उद्यम, जिसे उन्होंने स्वतंत्रता के आवरण में लपेट दिया था. जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की तरह वे शायद किसी एक विचार में स्थाई आस्था नहीं रखते थे, पर एक वकील की तरह वे हर उस विचार को तार्किक रूप से उचित ठहराने में दक्ष थे जिसमें वे उस समय विश्वास करते थे. यही चालाकी की प्रतिष्ठा आखिरकार उनके विनाश का कारण बनी.
सफल भारतीय राजनेता अपनी चतुराई को छिपाने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं. गांधी अपनी ‘हिमालयी भूलों’ की घोषणा सत्याग्रह की धमकियों से भी अधिक जोर-शोर से करते थे. नेहरू ने चीन युद्ध के बाद पश्चाताप की मुद्रा अपनाई और राष्ट्र ने उन्हें लगभग क्षमा कर दिया. मोरारजी देसाई की ‘मूत्र चिकित्सा’ भी एक तरह का सार्वजनिक आचरण था. लेकिन सीआर अपनी चतुराई को छिपाने में बहुत कच्चे रहे और इसकी कीमत चुकाई.
वे न तो पूरी तरह नैतिकतावादी थे, न ही श्रीमती गांधी की तरह नैतिकता-विहीन राजनेता. सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है. कोपले से यह सूक्ष्मता छूट गई लगती है; फिर भी, इस गंभीर प्रयास के लिए उन्हें पूरे अंक दिए जाने चाहिए.









