भरोसा और निरंतरता ऐसे अदृश्य धागे हैं, जो इंसानी रिश्तों को जोड़ते हैं। जब आप इन्हें स्वयं महसूस करें तो ये न सिर्फ एक कनेक्शन, बल्कि अटूट रिश्ता बना देते हैं। अपने करियर और निजी जीवन में मैंने पाया है कि भरोसा महज कहने से नहीं, बल्कि निरंतरता की आग में तप कर मजबूत बनता है।
कई दशक पहले एक हाई-स्टेक जॉब इंटरव्यू में मुझसे कहा गया कि मैं खुद को दो-तीन शब्दों में व्यक्त करूं। बगैर हिचकिचाहट मैंने कहा ‘मैं एक फायरफाइटर हूं।’ मेरी रचनात्मकता परखने के लिए एचआर हेड अरूप गुप्ता कुटिल मुस्कान के साथ बोले, ‘अगर तुमसे इस लाइन में एक शब्द और जोड़ने को कहूं तो वो क्या होगा?’ स्पष्टत: उन्हें किसी डेकोरेटिव, ‘गुड’ या ‘एफिशिएंट’ जैसे सामान्य-से विशेषण की उम्मीद थी, लेकिन मैंने उन्हें एक व्यावहारिक सच बोलकर चौंका दिया कि ‘मैं एक कंसिस्टेंट फायरफाइटर हूं।’
उनके चेहरे पर आई चमक साफ दिख रही थी। हालांकि, उन्होंने मजाकिया लहजे में यह बोल कर अपने भाव छिपाने की कोशिश की कि मैंने सिटी फायर ब्रिगेड के किसी अनुभव का जिक्र तो किया ही नहीं, लेकिन कमरे का माहौल तो साफ महसूस किया जा सकता था।
कंसिस्टेंट- इस एक शब्द ने उनका भरोसा जीत लिया। तब से बीते पैंतीस वर्षों में वैसा ही भरोसा हम दोनों के बीच बना हुआ है। प्रोफेशनल इंटरव्यू से शुरू हुआ एक रिश्ता आजीवन दोस्ती में बदल गया। यह साबित करता है कि निरंतरता ही वह बुनियाद है, जिस पर स्थायी वफादारी की इमारत टिकी होती है।








