दरअसल, जब मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़े दिसंबर के आखिर में आए, तो अर्थशास्त्री हैरान मगर खुश थे. वृद्धि बढ़कर 8.2 फीसद पहुंच गई, जो पहली तिमाही के 7.2 फीसद से ज्यादा और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के 7 फीसद के अनुमान से काफी ऊपर थी.
इससे एक अहम सवाल सामने आया. क्या अर्थव्यवस्था ने आखिरकार उस जड़ता को झटक दिया है, जो कोविड दौर के पहले से उसे घेरे हुए थी? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि टिक पाएगी, क्या निजी निवेश में जान डाल पाएगी और वह नौकरियां या रोजगार ला पाएगी, जिसकी देश को सख्त जरूरत है?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं. दूसरी तिमाही में ऊंची जीडीपी सिर्फ इसलिए नहीं आई कि कॉर्पोरेट कारोबार में कोई सुधार हुआ, जिससे मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र को मदद मिली. दरअसल इसकी वजह पिछले साल की दूसरी तिमाही का 5.6 फीसद का बेहद मामूली आधार था.
आंकड़ों को 0.5 फीसद जैसे बेहद कम जीडीपी डिफ्लेटर का सहारा भी मिला. डिफ्लेटर का इस्तेमाल नॉमिनल जीडीपी यानी मौजूदा कीमतों पर बिना महंगाई के असर को घटाए अर्थव्यवस्था में पैदा हुए कुल मूल्य को असली जीडीपी में बदलने के लिए किया जाता है, ताकि सिर्फ कीमतों में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि उत्पादन की सही तस्वीर सामने आ सके.
कुछ और संकेत भी बताते हैं कि अर्थव्यवस्था मजबूत दौर में दाखिल हो सकती है. पहला है कम महंगाई. यह लगातार कई महीनों तक रिजर्व बैंक के 2 से 4 फीसद के लक्ष्य के
निचले सिरे पर बनी रही. उसमें खाने-पीने की चीजों की कम महंगाई और कच्चे तेल की कम कीमतों की बड़ी भूमिका रही. दूसरी बड़ी वजह खपत की वापसी है.








