वह 2 नवंबर की रात थी जब दिलों की धड़कनें थाम लेने वाले कुछ लम्हे आए. यह तब हुआ जब क्रिकेट दीवानों को भारतीय टीम की जीत मुट्ठी में दिखने लगी. इस 2025 के महिला क्रिकेट विश्व कप फाइनल मैच पर देश भर में रिकॉर्ड 19 करोड़ लोग टीवी पर आंख गड़ाए बैठे थे और नवी मुंबई के डीवाइ पाटिल स्टेडियम में ज्यादातर नीले रंग की पोशाक में मौजूद 40,000 लोगों का जज्बा उफान ले रहा था.
उस पल तो धड़कनें अट्ठाहास करने लगीं, जब दक्षिण अफ्रीका की कप्तान लॉरा वूल्वाडर्ट के बल्ले से निकली गेंद आसमान छूने लगी और कलाबाजी खाकर अमनजोत कौर ने उसे लपक लिया, जो पहले ही सीधे विकेट पर गेंद फेंक कर रन आउट कराने से सबकी नजरों में चढ़ चुकी थीं. उस एक कैच ने ऐसे वक्त वूल्वाडर्ट की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जब वे भारत से मैच छीनती दिख रही थीं. ऐसा ही उफनता दूसरा पल वह था, जब दीप्ति शर्मा की यॉर्कर गेंद ने एन्नेरी डेरक्सेन को चलता कर तीसरी बार मैच जिताऊ पांच विकेट निकाले.
दीप्ति पहले उतनी ही गेंदों में 58 रन के जरिए घरेलू पारी को संभाला चुकी थीं. फिर, अपनी साथी खिलाड़ियों की हैरी दी, कप्तान हरमनप्रीत कौर ने गजब की दिमागी बाजीगरी दिखाई और बल्ले की छलांग दिखाने के लिए चर्चित शेफाली वर्मा को गेंद थमाकर जोखिम उठाया, लेकिन शेफाली ने दो बहुमूल्य विकेट चटका कर मानो तोहफा दे दिया. आखिरी करिश्मा कप्तान ने जादुई कलाबाजी के साथ कैच लपक कर मैच की इतिश्री की.
ज्यादातर कपिल के डेविल्स की बाद की पीढ़ी में जन्मीं इन ‘हैरी की हिरोइनों’ ने न सिर्फ भारत की पहली महिला विश्व कप जीत की पटकथा लिखी, बल्कि देश में स्त्री सशक्तीकरण का भी बुलंद मुकाम तैयार किया. 1983 में भारत की पहला पुरुष विश्व कप जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे क्रिकेट दिग्गज सुनील गावस्कर ने ऐलान किया, ”यह सदियों की जीत है. इसे भारतीय क्रिकेट के इतिहास की सबसे बड़ी जीत में एक माना जाएगा.’’
अपनी खुद की अकेली राह बनाने वाली टेनिस स्टार सानिया मिर्जा तो भावुक हो उठीं और कहा, ”यह जीत अपनी-सी लगती है. अगली बार जब कोई छोटी लड़की मां-बाप से कहेगी, ‘मैं स्मृति मंधाना बनना चाहती हूं’, तो वे उसे बकवास सपना नहीं समझेंगे.’’ स्मृति की दीवानी दस वर्षीया स्ट्रेना सौम्या बिस्वाल यही भावना दर्शा रही थी. वह उस दिन स्टैंड में एक पोस्टर पकड़े खड़ी थी, जिस पर लिखा था ‘वंडर वुमन ऑफ इंडिया—गो इंडिया गो!’








