छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल इसी साल जुलाई में खत्म होने जा रहा है. उन्हें एक्सटेंशन मिलने की उम्मीद लगभग न के बराबर है. इधर उनकी जगह नया प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा, इसकी बिसात बिछने लगी है.
संभावित उम्मीदवार बीते दो माह से लगातार दिल्ली दरबार की दौड़ लगा रहे हैं. बीते 15 जनवरी को जब राज्य के पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव दिल्ली जाकर राहुल गांधी से मिले, तो इस बात की चर्चा जोर से चली कि क्या सिंहदेव खुद अध्यक्ष बनना चाहते हैं.
इसके बाद प्रदेश में एक नाम अचानक इस दौड़ में शामिल हुआ. वे थे पूर्व मंत्री उमेश पटेल. उनको लेकर कहा गया कि सिंहदेव को दूर रखने के लिए पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने उमेश पटेल का नाम आगे किया है. उन्हें राहुल गांधी की पसंद भी बताया गया. लेकिन कांग्रेस के जानकारों का मानना है कि बघेल ने उमेश का नाम केवल आगे किया है, असल में तैयारी वे खुद के लिए कर रहे हैं. बघेल फिलहाल पंजाब के प्रभारी हैं. वे चाहते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव पंजाब चुनाव के बाद हो, ताकि वहां अपना दम दिखाने के बाद वे खुद इस पद पर दावा कर सकें.
इधर सिंहदेव लॉबी चाहती थी कि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को इस बार राज्यसभा भेजा जाए, ताकि समय से पूर्व अध्यक्ष का चुनाव हो और कमान सिंहदेव को मिले. लेकिन फूलो देवी नेताम को दोबारा राज्यसभा भेजने पर मुहर लगते ही, सिंहदेव लॉबी को झटका लगा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार प्रदेश कांग्रेस समिति (PCC) अध्यक्ष का चयन केवल संगठनात्मक कारणों से नहीं, बल्कि 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया जाएगा. कांग्रेस ऐसा नेता चाहती है जो पूरे प्रदेश में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साध सके और अलग-अलग वर्गों को जोड़ने की क्षमता रखता हो.
किसको मिलेगा ताज, कौन लगाएगा नैया पार
ऐसे में वह कौन सा चेहरा होगा जिसके दमखम पर 2028 के विधानसभा चुनाव का मैदान फतह किया जा सकता है? रेस में फिलहाल सबसे आगे उमेश पटेल दिख रहे हैं. युवा चेहरे के रूप में देखे जाने वाले उमेश पिछड़ा वर्ग से आते हैं. उनके पिता नंद कुमार पटेल की साल 2013 में झीरम घाटी नक्सली हमले मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद वे राजनीति में आए.
उमेश को राजनीति भले ही उन्हें विरासत में मिली, लेकिन उन्होंने अपना रास्ता खुद तैयार किया है. वे खरसिया विधानसभा से लगातार तीन बार विधायक हैं और पूर्ववर्ती सरकार में उच्च शिक्षा, कौशल विकास, खेल एवं युवा कल्याण जैसे विभागों के मंत्री रह चुके हैं. इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि और कॉर्पोरेट अनुभव रखने वाले उमेश पटेल को छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी की राजनीति का प्रतिनिधि माना जाता है. हालांकि, उनकी कमजोरी यह है कि मंत्री रहते हुए भी वे केवल अपने इलाके तक सीमित रहे और राज्य स्तरीय पहचान नहीं बना सके. हाल ही में कांग्रेस के ‘मनरेगा बचाओ आंदोलन’ के दौरान उन्होंने जरूर राज्यभर का दौरा किया है.
दूसरे बड़े दावेदार पूर्व सीएम भूपेश बघेल खुद हैं. हालांकि, उन्होंने अपनी दावेदारी को लेकर सीधे तौर पर कोई इशारा नहीं दिया है. वे भी पिछड़ा वर्ग से आते हैं और उन्हें जमीनी नेता माना जाता है. उनकी आक्रामक शैली और संगठन पर पकड़ उन्हें मजबूत दावेदार बनाती है. राज्य के युवा मोर्चा के एक नेता ने, जो बीते एक साल से प्रखंड स्तर पर काम कर रहे हैं, नाम न छापने की शर्त पर बताया, “बघेल को राज्य का सबसे बड़ा कांग्रेसी नेता मान सकते हैं, लेकिन असली दिक्कत यही है कि कोई प्रखंड या जिला अध्यक्ष उनसे सीधे नहीं मिल सकता. बतौर प्रदेश अध्यक्ष उन्होंने सत्ता दिलाई, लेकिन सीएम बनने के बाद कार्यकर्ताओं को उन तक पहुंचने के लिए विधायकों के पुल से गुजरना पड़ता था. मुमकिन है कि दोबारा अध्यक्ष बनने पर उनका पुराना तेवर और रास्ता लौट आए.”
तीसरे दावेदार पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव हैं. सरगुजा राजघराने से ताल्लुक रखने वाले सिंहदेव की छवि शांत, संतुलित और सर्वमान्य नेता की है. उत्तर छत्तीसगढ़ की कई सीटों पर उनका प्रभाव है और बेदाग राजनीतिक छवि उनका सबसे मजबूत पक्ष है. हालांकि, संगठन पर सीमित पकड़ उनकी कमजोरी मानी जा रही है. इनके अलावा पूर्व मंत्री शिव डहरिया का नाम भी चर्चा में है. अनुसूचित जाति से आने वाले डहरिया को आदिवासी इलाकों में प्रभावशाली माना जाता है. प्रदेश की बड़ी एससी-एसटी आबादी को देखते हुए उनका नाम समीकरणों में फिट बैठता है.








