शब-ए-बारात की छुट्टी का दिन था. विधानसभा का सत्र एक दिन के लिए स्थगित था. मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुबह उठकर अपने अधिकारियों के साथ पटना के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीएमसीएच पहुंच गए, जिसे वे बेड के मामले में एशिया का सबसे बड़ा अस्पताल बनाने में जुटे हैं. 5,462 बेड वाला अस्पताल. उन्होंने वहां चल रहे निर्माण कार्य का जायजा लिया और अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए.
इससे पहले वे दो दिन विधानसभा के बजट सत्र में व्यस्त रहे और उससे पहले वे एक दिन पटना के बुद्ध स्मृति पार्क का जायजा लेने पहुंच गए थे. वे अपनी समृद्धि यात्रा से 31 जनवरी को ही लौट कर पटना आए थे. इस वक्त उनकी समृद्धि यात्रा का दूसरा चरण चल रहा है. पहला चरण 16 जनवरी को भीषण सर्दी के बीच शुरू हुआ था, जो 24 जनवरी तक चला.
यह उस मुख्यमंत्री की दिनचर्या है, जो पिछले साल नवंबर में भारी बहुमत से चुनाव जीतकर आया है और दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. उनकी उम्र 74 साल हो गई है और विपक्षी नेता उसकी लगातार शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता का जिक्र छेड़ कर उन्हें थका हुआ मुख्यमंत्री बताते रहे हैं.
नीतीश की यह व्यस्तता नई नहीं है, प्रशासनिक मोर्चे पर उनकी सक्रियता की कहानी काफी पुरानी है. वे शुरुआती दिनों से इतनी ही सक्रियता दिखाते रहे हैं. हां, 2025 में उनकी सक्रियता कुछ बढ़ गई. पहले उन्होंने प्रगति यात्रा के जरिए पूरे बिहार का भ्रमण किया, हर जगह की लंबित योजनाओं की सूची तैयार कर अधिकारियों को इन्हें जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश दिया. ये योजना लगभग 50 हजार करोड़ रुपए के बजट की बनी. फिर इन घोषणाओं पर आधारित योजनाओं के शिलान्यास के लिए उन्होंने यात्राएं की और यही यात्राएं उनका प्रचार अभियान बन गईं.
इस वक्त नीतीश अपनी प्रगति यात्रा में उन्हीं योजनाओं का लोकार्पण कर रहे हैं. यह उनकी बिहार में 16वीं यात्रा है. उनकी यात्राओं पर किताब लिख चुके पत्रकार मिथिलेश कहते हैं, ”नीतीश की यह खासियत रही है कि चाहे चार डिग्री की कड़ाके की ठंड हो या जेठ की दुपहरी, उन्होंने हर परिस्थिति में यात्रा की है. पिछले बीस साल के शासन में उन्होंने 15 यात्राएं की हैं, मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने न्याय यात्रा की थी. इन यात्राओं के जरिए वे यह सुनिश्चित करते हैं कि बिहार के विकास के तमाम कामकाज इनकी निगरानी में और इनके विजन से हो रहे हैं.”
वैसे जानकार यह भी कहते हैं कि लगातार सक्रियता के जरिए वे उन विपक्षी नेताओं को एक तरह से जवाब भी दे रहे हैं, जो उन्हें थका हुआ, बीमार और निस्तेज बताते रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष भी इससे सहमत नजर आते हैं, ”नीतीश हमेशा से सक्रिय रहे हैं, मगर पिछले डेढ़ साल से वे अति सक्रिय हैं. उनकी सक्रियता सिर्फ यात्राओं में ही नहीं नजर आती, वे जहां जाते हैं समीक्षा बैठकें भी करते हैं. हर फाइल को गंभीरता से पढ़ते हैं और टिप्पणी करते हैं. इसके जरिए वे न सिर्फ विपक्ष बल्कि सहयोगी दल को भी यह संदेश देते हैं कि अभी वे कामकाज के लिए पूरी तरह फिट हैं.”
चुनाव जीतते ही उन्होंने सात निश्चय में से तीन को लागू कराना शुरू कर दिया और कैबिनेट की पहली बैठक में ही राज्य के औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया का खाका खींच दिया. उन्होंने तय कर दिया कि अगले पांच साल में उनकी सरकार का लक्ष्य सूबे के लोगों की आय दोगुनी करना, एक करोड़ से अधिक रोजगार पैदा करना, आम लोगों के जीवन को आसान बनाना और बिहार को औद्योगिक राज्य और पूर्वी भारत का टेक हब बनाना है.
वैसे उन्होंने सियासी बयान देना काफी कम कर दिया है. मगर अंदरखाने यह चर्चा भी है कि वे इस चुनाव में 85 सीटें लाकर भी संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि भाजपा की सीटें उनके चार अधिक हैं. जद (यू) के बड़े नेताओं को उन्होंने टैली बढ़ाने के अभियान में लगा दिया है. बताया जाता है कि कांग्रेस और एआइएमआइएम के विधायक उनके संपर्क में हैं. उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायकों पर भी उनका असर है.
राज्य के सियासी हलकों में दबे-छिपे उनके रिटायरमेंट और उनके पुत्र निशांत के राजनीति में आने की चर्चा चलती है. यह भी कहा जाता है कि भाजपा अब उनके बाद अपना सीएम बनाने की कोशिश में है. ऐसी स्थिति में वे अपने दल की स्थिति भी मजबूत करने में जुटे हैं. उनके एक करीबी अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं, ”नीतीश पहले शतक लगाएंगे, फिर रिटायर होंगे.” मतलब यह कि वे जद (यू) की सीटों के आंकड़े को सौ के करीब पहुंचाना चाहते हैं. बहरहाल, इन चर्चाओं के बीच नीतीश खुद को सक्रिय और फिट साबित करने में जुटे हैं.









