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बांग्लादेश के नए विदेश मंत्री खलीलुर रहमान भारत के लिए राहत साबित होंगे या मुसीबत? खलीलुर रहमान वैचारिक रूप से भारत विरोधी नहीं हैं, लेकिन अमेरिका में उनके गहरे संपर्क हैं और चीन के साथ भी उनके कामकाजी रिश्ते बेहतर हैं. इससे उनकी पहुंच दुनिया के कई पावर सेंटर्स तक हो जाती है

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बांग्लादेश के नए विदेश मंत्री खलीलुर रहमान भारत के लिए राहत साबित होंगे या मुसीबत?

खलीलुर रहमान वैचारिक रूप से भारत विरोधी नहीं हैं, लेकिन अमेरिका में उनके गहरे संपर्क हैं और चीन के साथ भी उनके कामकाजी रिश्ते बेहतर हैं. इससे उनकी पहुंच दुनिया के कई पावर सेंटर्स तक हो जाती है

डॉ. खलीलुर रहमान की बांग्लादेश के विदेश मंत्री के रूप में नियुक्ति ने ढाका की राजनीति में एक नया और थोड़ा हैरान करने वाला मोड़ ला दिया है. उनका प्रमोशन न केवल राजनीतिक हलकों के बाहर अप्रत्याशित थी, बल्कि ऐसा लगता है कि इसने सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को भी चौंका दिया है.

BNP के एक वरिष्ठ सूत्र के मुताबिक, 16 फरवरी की रात तक पार्टी के भीतर जो प्रस्तावित मंत्रियों की सूची घूम रही थी, उसमें खलीलुर का नाम कहीं नहीं था. अगले ही दिन उन्होंने पद की शपथ ले ली. BNP के कई बड़े नेताओं ने निजी बातचीत में स्वीकार किया है कि वे इस फैसले से हैरान थे. यह प्रतिक्रिया खलीलुर की राजनीतिक स्थिति और पार्टी के साथ उनके पुराने रिश्तों को लेकर एक तरह की बेचैनी को दर्शाती है.

18 फरवरी को खलीलुर ने कहा, “मैं ज़बरदस्ती विदेश मंत्री नहीं बना हूं.” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वे “राष्ट्रीय गरिमा, आपसी लाभ और संप्रभुता की रक्षा करते हुए विदेश नीति का संचालन करेंगे.” यह प्रधानमंत्री तारिक रहमान की ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की नीति के अनुरूप ही है.

खलीलुर का उभार इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि BNP के साथ उनका इतिहास काफी उलझा हुआ रहा है. हाल तक, पार्टी के भीतर उन्हें एक साथी के बजाय एक ‘बाहरी व्यक्ति’ के रूप में देखा जाता था. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में उनकी नियुक्ति पर BNP नेताओं ने खुले तौर पर सवाल उठाए थे. कुछ ने तो उन्हें बिना जनादेश के सरकार पर ज्यादा असर रखने वाला व्यक्ति बताया था.

उस समय खलीलुर के खिलाफ एक ऑनलाइन अभियान भी चला था, जिसमें उन्हें हटाने की मांग की गई थी. आरोप था कि उनके पास अभी-भी अमेरिकी नागरिकता है, जिससे कानूनी और राजनीतिक चिंताएं पैदा हुई थीं. उस वक्त खलीलुर को यूनुस के ‘टेक्नोक्रैटिक इनर सर्कल’ का हिस्सा माना जाता था. यानी उन लोगों में उनको शामिल किया जाता था जो सरकार को तकनीकी मामलों पर सलाह देत हैं और यूनुस का जिनपर काफी भरोसा है. BNP ने तब आधिकारिक तौर पर यूनुस कैबिनेट के जिन तीन सलाहकारों को हटाने की मांग की थी, उनमें से एक खलीलुर भी थे.

इसके अलावा, बांग्लादेश के सेना प्रमुख वकार-उज़-ज़मान के साथ खलीलुर के रिश्तों के बारे में भी काफी चर्चा रही है, जिनके बारे में कई लोगों का दावा है कि वे बहुत सहज नहीं थे.

BNP के भीतर यह विरोध तब अचानक कम हो गया जब खलीलुर 13 जून, 2025 को लंदन में यूनुस और तारिक रहमान के बीच हुई बैठक में मौजूद रहे. कई लोग इस बातचीत को मुमकिन बनाने का श्रेय खलीलुर को ही देते हैं. बैठक के बाद, उनके खिलाफ पार्टी के अंदरूनी हमले शांत हो गए और नागरिकता को लेकर चल रहा विवाद भी सार्वजनिक चर्चा से गायब हो गया.

इस चुप्पी को एक समर्थन के बजाय ‘राजनीतिक युद्धविराम’ के रूप में देखा गया. यही वजह है कि BNP के उन लोगों के लिए खलीलुर की विदेश मंत्री के रूप में नियुक्ति और भी चौंकाने वाली थी, जिन्होंने उन्हें कभी पार्टी के दीर्घकालिक नेतृत्व का हिस्सा नहीं माना था.

बांग्लादेश पर नज़र रखने वाले स्वतंत्र मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज़’ के नजमुल अहसान के अनुसार, खलीलुर 2001 में उस कार्यवाहक सरकार के मुख्य सलाहकार के निजी सचिव थे, जिसकी निगरानी में हुए चुनाव में BNP को भारी जीत मिली थी.

उनकी नियुक्ति के बाद से खलीलुर की विदेश नीति की दिशा को लेकर अटकलें तेज़ हो गई हैं. BNP के भीतर भी उनकी वैचारिक झुकाव की कोई एक स्पष्ट व्याख्या नहीं है. कुछ नेता उन्हें ‘प्रो-अमेरिकन’ बताते हैं जो साथ ही चीन के साथ निपटने में भी सहज हैं. दक्षिण एशिया के ध्रुवीकृत रणनीतिक माहौल में यह एक अनोखा मेल है. अन्य लोगों का मानना है कि भारत के प्रति उनका रुख नरम रहने की संभावना है. ढाका में खलीलुर ने सभी प्रमुख देशों के दूतावासों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखा है, जिससे उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की बनी है जो टकराव के बजाय ‘कैलकुलेशन’ पर भरोसा करता है.

भारत के लिए खलीलुर कोई अनजान चेहरा नहीं हैं. अप्रैल 2025 में, जब वे रोहिंग्या मुद्दों पर ‘हाई रिप्रेजेन्टेटिव’ के रूप में काम कर रहे थे, तब उन्होंने बैंकॉक में बिम्सटेक (BIMSTEC) शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मुलाकात की थी. यह मुलाकात उसी समय हुई थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 में कार्यभार संभालने के बाद पहली बार यूनुस के साथ बातचीत की थी.

डोभाल के साथ खलीलुर की बैठक की एक तस्वीर काफी वायरल हुई थी और दोनों देशों के राजनयिक हलकों में चर्चा का विषय बनी थी. इसके कुछ ही दिनों बाद, खलीलुर को बांग्लादेश में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर प्रमोट कर दिया गया, जिससे उनके बढ़ते प्रभाव का पता चला.

भारत के साथ यह संपर्क यहीं खत्म नहीं हुआ. पिछले नवंबर में, खलीलुर को डोभाल ने ‘कोलंबो सुरक्षा परिषद’ की बैठक में भाग लेने के लिए नई दिल्ली आमंत्रित किया था. यूनुस के पूर्व प्रेस सचिव शफीकुल आलम की एक फेसबुक पोस्ट के अनुसार, ये बैठकें महज औपचारिक नहीं थीं, बल्कि काफी ठोस और सोची-समझी थीं.

भारतीय अधिकारियों के लिए, यह रिकॉर्ड खलीलुर को सीधे तौर पर ‘भारत-विरोधी’ कहने की कोशिश को मुश्किल बना देता है. इसके बजाय, उन्हें एक ऐसे पेशेवर के रूप में देखा जाता है जो एक शक्तिशाली पड़ोसी के साथ लगातार टकराव की कीमत और रणनीतिक दिखावे की सीमाओं को समझता है.

इसलिए, उनकी नियुक्ति पर भारतीय खेमे की प्रतिक्रिया खतरे की घंटी के बजाय ‘सतर्क उम्मीद’ वाली रही है. यह माना जा रहा है कि खलीलुर वैचारिक रूप से भारत के खिलाफ नहीं हैं और वे क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की गहरी समझ रखते हैं. साथ ही, भारतीय अधिकारी इस बात से भी पूरी तरह वाकिफ हैं कि वाशिंगटन में उनके गहरे संपर्क हैं और बीजिंग के साथ भी उनके कामकाजी रिश्ते हैं, जिससे उन्हें सत्ता के कई केंद्रों तक पहुंच मिलती है.

पत्रकार और दक्षिण एशिया विशेषज्ञ स्निग्धेंदु भट्टाचार्य कहते हैं, “BNP का झुकाव पारंपरिक रूप से चीन की तरफ रहा है. खलीलुर रहमान की विदेश मंत्री के रूप में नियुक्ति के साथ ऐसा लगता है कि अमेरिका, भारत और बांग्लादेश (जहां अभी BNP सरकार है) के हित एक साथ आ गए हैं.”

खलीलुर की नियुक्ति अमेरिका-भारत-बांग्लादेश के रणनीतिक त्रिकोण में एक नए तालमेल का संकेत देती है. फिलहाल, ज्यादातर राजनयिक इसे किसी एक तरफ झुकने के बजाय ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के दावे के रूप में देख रहे हैं.

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