उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना सवालों के घेरे में है. जिस योजना को छोटे और सीमांत किसानों को सीधी आर्थिक मदद देने के लिए शुरू किया गया था, उसी में डुप्लीकेट और अपात्र लाभार्थियों की परतें खुल रही हैं. राज्य के कई जिलों में जांच के दौरान ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां पति और पत्नी दोनों ने एक ही परिवार और एक ही जमीन के आधार पर योजना का लाभ लिया.
प्रयागराज जिले में लगभग 28,628 लाभार्थी ऐसे मिले, जो पति-पत्नी हैं और दोनों के खाते में सम्मान निधि की किश्तें पहुंच रही थीं. सरकारी नियम साफ कहते हैं कि भले पति-पत्नी दोनों के नाम खेती की जमीन दर्ज हो, लेकिन परिवार से केवल एक सदस्य को योजना का लाभ मिल सकता है.
जून 2025 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने संदिग्ध लाभार्थियों की सूची जिला प्रशासन को भेजी. उप कृषि निदेशक पवन कुमार विश्वकर्मा की अगुवाई में सत्यापन हुआ. जांच में ज्यादातर मामलों में पति-पत्नी दोनों के लाभार्थी होने की पुष्टि हुई. कुछ मामलों में माता-पुत्र और पिता-पुत्र भी पाए गए. नियमों के अनुसार यदि जमीन वर्ष 2019 से पहले अलग-अलग नाम दर्ज है तो माता या पिता के साथ पुत्र लाभ ले सकता है, लेकिन बाद में ट्रांसफर हुई जमीन पर नया नाम जुड़ने से पात्रता स्वतः नहीं बनती.
प्रयागराज जिले के गंगापार और यमुनापार क्षेत्र में करीब आठ लाख किसान हैं, जिनमें से 6.32 लाख को योजना का लाभ मिल रहा है. राशन कार्ड और आधार से लिंक डेटा के मिलान में पति-पत्नी के नाम एक ही परिवार में दर्ज पाए गए, जिससे संदेह गहरा हुआ. सत्यापन रिपोर्ट केंद्र को भेज दी गई है और अंतिम निर्णय शासन स्तर पर होना है.
बहराइच जिले में भी इसी तरह की अनियमितता सामने आई. कृषि विभाग की जांच में 15,345 दंपत्तियों ने दोहरा लाभ लिया पाया गया. यानी 30,690 लाभार्थी इस श्रेणी में आए. शासन स्तर पर जानकारी पहुंचते ही अगली किस्त पर रोक लगा दी गई. जिले में 4.80 लाख से अधिक किसानों का पंजीकरण है. योजना के तहत हर साल छह हजार रुपये तीन किस्तों में दिए जाते हैं. एक अगस्त को अगली किस्त जारी हुई थी, लेकिन दंपत्तियों के दोहरे लाभ के मामले के बाद भुगतान पर रोक लग गई. एक वरिष्ठ जिला कृषि अधिकारी के मुताबिक, “अब प्रत्येक परिवार से केवल एक सदस्य को लाभ देने की प्रक्रिया तय की जा रही है. जिन मामलों में गड़बड़ी पाई गई है, वहां वसूली या समायोजन जैसे विकल्पों पर भी विचार हो रहा है.”
मामला सिर्फ दो जिलों तक सीमित नहीं है. राज्य सरकार करीब 29.74 लाख लाभार्थियों का सत्यापन कर रही है, जिन्हें केंद्र सरकार ने संदिग्ध श्रेणी में रखा है. इनमें 11,07,498 मामले ऐसे हैं जहां पति-पत्नी दोनों पर लाभ लेने का संदेह है. 33,466 मामले नाबालिगों के नाम पर भुगतान से जुड़े हैं. 12,30,192 मामले ऐसे हैं जिनमें जमीन के पुराने मालिक के नाम पर भुगतान जारी रहने का शक है. 3,10,931 मामलों में पुराने और नए मालिक दोनों के खाते में किस्त जाने की आशंका है; इसके अलावा 2,91,908 मामले ऐसे हैं जहां विरासत के अलावा अन्य कारणों से हुए म्यूटेशन के बाद भी लाभ जारी रहा. राज्य कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “कुल मिलाकर 29,73,995 लाभार्थी सत्यापन के दायरे में हैं. राजस्व और कृषि विभाग संयुक्त रूप से जांच कर रहे हैं. जहां गड़बड़ी मिलेगी, वहां नियमानुसार कार्रवाई होगी.”
फरवरी 2019 में शुरू की गई इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर चार महीने में दो हजार रुपये की तीन किस्तों में सालाना छह हजार रुपये मिलते हैं. नवंबर 2025 में 21वीं किस्त तक उत्तर प्रदेश में 90,354.32 करोड़ रुपये 2.15 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को हस्तांतरित किए जा चुके हैं. शुरुआत में यह योजना छोटे और सीमांत किसानों तक सीमित थी, बाद में इसे सभी पात्र किसानों के लिए खोल दिया गया. इसी विस्तार के साथ डेटा की जटिलता भी बढ़ी. जमीन के स्वामित्व, म्यूटेशन, विरासत और परिवार की परिभाषा जैसे मुद्दों ने पात्रता को उलझाया.
योजना की किश्तें आधार से लिंक बैंक खातों में सीधे जाती हैं. ई-केवाईसी अनिवार्य है. राशन कार्ड भी आधार से लिंक हैं. शासन ने जब दोनों डाटाबेस का मिलान कराया तो कई परिवारों में पति-पत्नी दोनों के नाम सामने आए; डिजिटल गवर्नेंस विशेषज्ञों का मानना है कि यही तकनीकी क्रॉस-चेक अब गड़बड़ियों को पकड़ने का मुख्य औजार बन रहा है. लखनऊ स्थित एक सार्वजनिक नीति विश्लेषक का कहना है, “डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने बिचौलियों को हटाया, लेकिन अब चुनौती डेटा की शुद्धता की है. जमीन रिकॉर्ड और परिवार की संरचना में छोटे अंतर भी डुप्लीकेट क्लेम का कारण बनते हैं.”
दिलचस्प तथ्य यह है कि कई लाभार्थियों ने स्वयं 100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वापस की है. यह रकम उन लोगों ने लौटाई जिन्होंने महसूस किया कि वे पात्र नहीं थे. हालांकि कृषि विभाग के पास यह स्पष्ट डेटा नहीं है कि कितने किसानों ने राशि लौटाई. एक अधिकारी ने कहा, “हमें कुल वापस की गई राशि का अंदाजा है, लेकिन कितने किसानों ने यह किया, इसकी विस्तृत जानकारी बैंकों से अभी नहीं मिली है.”
यह पहल बताती है कि योजना के प्रति भरोसा बना हुआ है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाती है कि पात्रता को लेकर भ्रम या जानकारी की कमी भी रही. किसान नेता आलोक वर्मा बताते हैं कि ऐसे मामलों की जांच प्रक्रिया आसान नहीं है. जमीन के रिकॉर्ड कई बार अद्यतन नहीं होते. परिवारों में बंटवारा, बिक्री, गिफ्ट या अन्य कारणों से म्यूटेशन की जटिलता बढ़ती है. विरासत में पात्रता हस्तांतरण संभव है, लेकिन बिक्री के बाद पुराने मालिक को भुगतान जारी रहना नियम विरुद्ध है. राजस्व रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण के बावजूद जमीनी स्तर पर कई विसंगतियां बनी हुई हैं. ग्रामीण इलाकों में नामांतरण की प्रक्रिया लंबी है, जिससे पुराने रिकॉर्ड लंबे समय तक बने रहते हैं.
विश्लेषकों की राय बंटी हुई है. कुछ इसे सिस्टम की तकनीकी खामी मानते हैं, जहां अलग-अलग डाटाबेस के समन्वय की कमी से डुप्लीकेट भुगतान हुआ. अन्य इसे जानबूझकर की गई अनियमितता बताते हैं. जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में संदिग्ध मामलों का सामने आना बताता है कि प्रारंभिक सत्यापन पर्याप्त मजबूत नहीं था. योजना का तेजी से विस्तार हुआ, लेकिन जमीन रिकॉर्ड और परिवार की परिभाषा के बीच तालमेल पर उतना ध्यान नहीं गया. सरकार अब 22वीं किस्त से पहले सत्यापन प्रक्रिया को और सख्त करने की तैयारी में है. जिन मामलों में अपात्रता साबित होगी, वहां भुगतान रोका जाएगा और संभव है कि वसूली भी की जाए.
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहां 2 करोड़ से अधिक लाभार्थी हैं, थोड़ी सी प्रशासनिक चूक भी लाखों मामलों को प्रभावित कर सकती है. प्रयागराज और बहराइच की घटनाएं संकेत देती हैं कि सिस्टम में सुधार की जरूरत है, लेकिन यह भी दिखाती हैं कि डेटा मिलान और डिजिटल निगरानी से गड़बड़ियों की पहचान संभव है. अब चुनौती यह है कि जांच निष्पक्ष हो, पात्र किसानों का भरोसा बना रहे और अपात्र दावों पर सख्ती से रोक लगे.








