Home » National News » लंबी रेस का पक्का फॉर्मूला सुधार की महत्वाकांक्षा और राजकोषीय विकल्पों से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, नौकरियों और निवेशकों के विश्वास तक बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे इकोनॉमिस्ट्स (बाइट) ने 1 फरवरी को पेश केंद्रीय बजट के वादों का व्यापक विश्लेषण किया है.

लंबी रेस का पक्का फॉर्मूला सुधार की महत्वाकांक्षा और राजकोषीय विकल्पों से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, नौकरियों और निवेशकों के विश्वास तक बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे इकोनॉमिस्ट्स (बाइट) ने 1 फरवरी को पेश केंद्रीय बजट के वादों का व्यापक विश्लेषण किया है.

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प्र. आपकी राय में बजट में फोकस वाले तीन सबसे बड़े क्षेत्र कौन से हैं?

● नीलकंठ मिश्र: पहला और सबसे अहम जोर है, सरकारी खजाने की मजबूती की उस राह पर टिके रहना जिसे सरकार ने पिछले साल बताया था. अर्थव्यवस्था में मध्य और लंबी अवधि की पूंजी की लागत कम करने के लिए सरकार की विश्वसनीयता बढ़ाना और अनुमान लगाने की क्षमता में बढ़ोतरी महत्वपूर्ण है.

दूसरा, खर्च की क्वालिटी को प्राथमिकता देना—कुल खर्च की तुलना में ज्यादा पूंजीगत खर्च का बजट रखा गया है. तीसरा, सरकार ने सेवाओं, सामान के निर्यात के लिए ग्रोथ का रोडमैप बनाया है, जैसे मध्यवर्ती यानी इंटरमीडिएट सामान पर कस्टम ड्यूटी का सरलीकरण किया और पहले के कई क्यूसीओ (क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर) रद्द किए; अमेरिकी करार होने के बाद अब भारत के 70 प्रतिशत निर्यात एफटीए के तहत आते हैं और बेहतर शहरी आधारभूत ढांचे (शहरी आॢथक क्षेत्र के लिए समर्थन और म्युनिसिपल बॉन्डों का विस्तार) की भी राह तैयार की है.

● आशिमा गोयल: पहला, पिछले कुछ साल में सफल रहे तीन तरीकों को जारी रखा गया है: राजकोष की मजबूती, खर्च की बेहतर संरचना के जरिए प्रोत्साहन, टैक्स का सरलीकरण और प्रोसेस में सुधार. इस साल, सरकार ने यह सिद्धांत बनाया है कि सरकार सिर्फ निवेश के लिए उधार लेगी. दूसरा, मौजूदा जरूरतों के लिहाज से कदम उठाना जैसे वैश्विक अस्थिरता से निबटने को मजबूती बढ़ाना, श्रम बहुल सेवाओं और टेक-आधारित स्किल को समर्थन देना. तीसरा, विकसित भारत का निर्माण करने के लिए स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंसिंग, टेक्नोलॉजी और तमाम तरह के प्रोत्साहनों का इस्तेमाल करना.

● मदन सबनवीस: तीन सबसे बड़े फोकस एरिया हैं: एमएसएमई को बढ़ावा देना, पूंजीगत खर्च (जिसमें शहरी विकास, रेल कॉरिडोर और जलमार्ग शामिल हैं) और डेटा सेंटर और रेयर अर्थ जैसी नई ग्रोथ इंडस्ट्री, जो भविष्य की ज्यादा हैं और राजकोषीय विवेक के साथ इन पर ध्यान दिया गया है.

● इला पटनायक: फोकस वाले तीन सबसे बड़े क्षेत्र हैं: पहला, मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता: सात रणनीतिक क्षेत्रों (सेमीकंडक्टर, बायोफार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रेयर अर्थ, रसायन, कैपिटल गुड्स, टेेक्सटाइल्स) में ठोस योजनाओं और फंडिंग के साथ लक्षित हस्तक्षेप किए गए हैं; यह ऐसी औद्योगिक नीति है जिसमें विकास के साथ निवेश लाने का इरादा भी शामिल है.

दूसरा, सेवा-आधारित रोजगार: शिक्षा-से-रोजगार के लिए उच्चाधिकार समिति से इस मौलिक बदलाव का संकेत मिलता है कि नौकरी के लिए कौशल ठीक करना जरूरी है, यह माना गया है कि भारत के आबादी लाभ के लिए मैन्युफैक्चरिंग के अलावा कार्यबल के व्यवस्थित विकास की भी जरूरत है.

तीसरा, अग्रणी टेक्नोलॉजी से जुड़ाव: बजट में उभरती हुई तकनीक के साथ स्वाभाविक तालमेल दिखता है. इसमें एआइ मिशन, 2047 तक क्लाउड सेवाओं को कर छूट, पांच क्षेत्रों में सीसीयूएस (कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण) और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का विकास. ये भारत की जीवाश्म-ईंधन के बाद की विकास रणनीति के स्तंभ हैं.

प्र. वैश्विक अनिश्चितता और राजकोष की सीमित गुंजाइश के दौर में क्या इस बजट से भारत का आर्थिक विकास तेज हो सकता है?

● नीलकंठ मिश्र: भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी से पहले की राह से लगभग 10 प्रतिशत पीछे है. भारत में नीति-निर्माताओं ने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और आउटपुट के इस अंतर को कम करने के लिए मौद्रिक रास्ता चुना है. लेकिन राजकोष के शानदार अनुशासन, कम महंगाई और आरबीआइ की दर कटौती के बावजूद बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है, जो अर्थव्यवस्था में बिना जोखिम वाली दर का प्रतीक होती है. सरकार के बेहतर नकद प्रबंधन, बॉन्ड जारी करने की अवधियों के बेहतर मेल और आरबीआइ के नकदी डालने से मदद मिलनी चाहिए.

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