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सरकार कल्याण कार्यक्रमों के लिए RBI की डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल करना क्यों चाहती है?

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गुजरात में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है जिसके तहत सब्सिडी वाले राशन के लिए डिजिटल रुपए के इस्तेमाल को परखा जाएगा. यह प्रोजेक्ट भारत में कल्याणकारी योजनाओं के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है

फरवरी की 15 तारीख को अहमदाबाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की. यह प्रोजेक्ट सरकार की योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकता है. इसमें राशन कार्ड जैसी पारंपरिक व्यवस्था की जगह डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किया जा रहा है.

इस योजना के तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की डिजिटल करेंसी, यानी डिजिटल रुपया या CBDC को सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस से जोड़ा गया है. पीडीएस के जरिए गरीब परिवारों को सस्ते दाम पर गेहूं, चावल और अन्य खाद्यान्न दिया जाता है. डिजिटल रुपया भारत की सरकारी मुद्रा का डिजिटल रूप है.

इस बदलाव को समझने के लिए पुरानी व्यवस्था को देखना जरूरी है. पहले पात्र परिवारों को राशन कार्ड के जरिए अनाज मिलता था. इसका हिसाब सरकार के रिकॉर्ड और सब्सिडी खातों में रखा जाता था. बाद में आधार और बायोमेट्रिक पहचान को जोड़ा गया. इसके बावजूद सिस्टम में कागजी काम, मैनुअल जांच और बिचौलियों की भूमिका बनी रही.

अब इस पायलट प्रोजेक्ट में लाभार्थियों को डिजिटल टोकन दिए जा रहे हैं, जो ई-रुपया में होते हैं. ये टोकन एक डिजिटल वॉलेट में रहते हैं. लाभार्थी इन्हें सीधे तय राशन दुकानों पर इस्तेमाल कर सकते हैं. अब कागजी कूपन या सब्सिडी का अलग से हिसाब नहीं रखा जाएगा. राशन का अधिकार खुद एक डिजिटल करेंसी बन गया है, जिसे सिर्फ तय राशन सामान खरीदने में ही इस्तेमाल किया जा सकता है.

सरकार का कहना है कि पीडीएस में लंबे समय से कई कमजोरियां रही हैं. आधार और इलेक्ट्रॉनिक मशीनें लगने के बाद भी राशन की चोरी पूरी तरह नहीं रुकी. कई जगह अनाज खुले बाजार में बिकता रहा. फर्जी नामों से राशन लिया गया. दुकानदारों ने रिकॉर्ड में हेरफेर की. सब्सिडी के भुगतान में भी देरी होती रही. कागजी और कमजोर डिजिटल सिस्टम की वजह से गड़बड़ी पकड़ना मुश्किल था.

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