साड़ी को संस्कृत में शाटिका बोलते हैं, यानी ‘कपड़े की पट्टी’. लेकिन भारतीय महिलाओं और कुछ पुरुषों के लिए सूती, सिल्क या लिनन से बनी साड़ियां केवल एक परिधान नहीं हैं. कई लोगों के लिए ये पहचान का हिस्सा भी है.
इसके मुताबिक साड़ी के अस्तित्व के प्रमाण लगभग 3200 ईसा-पूर्व यानी 5000 साल से भी ज़्यादा पुरानी सभ्यताओं में मिलते हैं. इनमें मिस्र की सभ्यता, सिंधु घाटी की सभ्यता और इसके बाद भारत में मौर्यों के अधीन विकसित सभ्यताएं शामिल हैं.
अगर साड़ी के इतिहास की बात की जाए तो इसका ज़िक्र सांस्कृतिक इतिहासकार कमला एस. डोंगरकेरी की किताब ‘द इंडियन साड़ी’ में मिलता है.
मशहूर साड़ी इतिहासकार और लेखिका ऋता कपूर चिश्ती ने अपनी किताब ‘साड़ीज़: ट्रेडिशन एंड बियॉन्ड’ में साड़ी पहनने के करीब 108 पारंपरिक तरीकों के बारे में बताया है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, “पूरे भारत में अपने अध्ययन के दौरान हमने हर राज्य में लगभग 2-3 महीने बिताए. अपनी किताब में हमने ज़्यादातर राज्यों में साड़ी पहनने के करीब 7-8 स्टाइल दर्शाए हैं. हालांकि कई और ऐसे स्टाइल हो सकते हैं जो अभी इसमें शामिल न हो पाए हों.”
सीधा पल्लू

कमला एस. डोंगरकेरी की किताब ‘द इंडियन साड़ी’ में निवी या मॉर्डन स्टाइल को आधुनिक दौर में भारतीय महिलाओं द्वारा साड़ी पहनने का सबसे सामान्य तरीका बताया गया है. इसमें साड़ी को कमर के चारों तरफ लपेटकर सामने की ओर प्लीट्स बनाई जाती हैं और पल्लू को बाएं कंधे पर डाला जाता है, जिसे आम भाषा में उल्टा पल्लू भी कहा जाता है. यह तरीका न सिर्फ़ देखने में सुंदर है बल्कि पहनने में आसान और रोज़ के काम करने में व्यावहारिक भी होता है.
निवी

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