Home » सामाजिक मुद्दे » संगम, संत और सत्ता

संगम, संत और सत्ता

Facebook
Twitter
WhatsApp
Telegram

माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान को लेकर प्रशासन से टकराव ने आस्था, कानून और सियासत को आमने-सामने ला दिया

प्रयागराज के माघ मेले से 28 जनवरी को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का बिना स्नान किए लौट जाना केवल एक धार्मिक घटना नहीं रही. यह मामला आस्था, प्रशासनिक प्रोटोकॉल, सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवाद और उत्तर प्रदेश की सियासत के जटिल संगम में बदल गया. 11 दिन के अनशन के बाद मेला परिसर छोड़ते हुए शंकराचार्य ने दावा किया कि इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. इस दावे ने प्रशासन को कठघरे में ला दिया, वहीं सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए असहज सवाल खड़े कर दिए.

विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन हुई, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पालकी और बड़ी संख्या में शिष्यों के साथ संगम स्नान के लिए निकले. संगम नोज पर भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस और मेला प्रशासन ने कथित सुरक्षा कारणों से उन्हें सीमित संख्या में पैदल जाकर स्नान करने की पेशकश की. लेकिन बात नहीं बनी.

संगम नोज वॉच टावर के पास हंगामा हुआ, शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की नौबत आई और आखिरकार शंकराचार्य को बैरंग लौटना पड़ा. इसके बाद सेक्टर-4, त्रिवेणी रोड स्थित अपने शिविर में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अनशन पर बैठ गए. उनका आरोप था कि उन्हें जान-बूझकर रोका गया, जबकि अन्य संतों को प्रोटोकॉल मिला. प्रयागराज मंडल की कमिशनर सौम्या अग्रवाल बताती हैं, ”शंकराचार्य की ओर से स्नान की औपचारिक सूचना नहीं दी गई थी. उन्हें स्नान से नहीं रोका गया, केवल जुलूस की अनुमति नहीं दी गई थी.”

इसी बीच 19 जनवरी को मेला अथॉरिटी का एक नोटिस सामने आया, जिसने विवाद को और संवेदनशील बना दिया. नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक सिविल अपील का हवाला देते हुए पूछा गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद किस आधार पर खुद को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बता रहे हैं. नोटिस में कहा गया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम आदेश नहीं देता, किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य नहीं माना जा सकता.

मेला परिसर में लगाए गए बोर्ड को भी कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया गया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के कम्युनिकेशन इंचार्ज संजय पांडे का कहना है कि शंकराचार्य की परंपरा 2,500 साल से ज्यादा पुरानी है, जिसके तहत उत्तराधिकार गुरु तय करता है, न कि अदालत या सरकार. नोटिस के समय पर भी सवाल उठाए गए कि एक महीने से कैंप चल रहा था, लेकिन प्रशासन अचानक इसी मुद्दे पर क्यों जागा.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का व्यक्तित्व और इतिहास इस विवाद को और गहरा बनाता है. सितंबर 2022 में उनके गुरु, द्वारका शारदा और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उन्हें ज्योतिषपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. तभी से यह पद कानूनी और वैचारिक विवादों में है. 1969 में उत्तर प्रदेश के ही प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में जन्मे उमाशंकर उपाध्याय आगे चलकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बने.

गुजरात और काशी में शिक्षा, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की पढ़ाई, और छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका ने उन्हें एक जुझारू संत के रूप में गढ़ा. वे 1990 के दशक में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे और संस्कृत संवर्धन के लिए संगठन भी बनाया. वर्ष 2000 में ब्रह्मचारी और 2003 में संन्यास दीक्षा के बाद उन्होंने राम मंदिर, रामसेतु, अविरल गंगा और गोरक्षा जैसे मुद्दों पर आंदोलनों की कमान संभाली.

विवाद उनके जीवन का स्थायी हिस्सा रहे हैं. काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के दौरान मंदिरों के ध्वस्तीकरण का विरोध, 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने के लिए लंबा अनशन, ज्ञानवापी परिसर में पूजा के ऐलान पर 108 घंटे की भूख हड़ताल, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल न होना और अधूरे मंदिर पर सवाल उठाना, ये सभी घटनाएं उनकी छवि को मुखर और

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

UCF India News हिंदी के साथ रहें अपडेट

सब्स्क्राइब कीजिए हमारा डेली न्यूजलेटर और पाइए खबरें आपके इनबॉक्स में

और खबरें

जंग के माहौल में भारत ने 50 हजार लोगों को इजरायल भेजने पर सहमति क्यों जताई? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायल यात्रा का जो ज्वाइंट स्टेमेंट जारी हुआ है, उसके मुताबिक भारत अगले पांच सालों में 50,000 कामगार इजरायल भेजेगा

  “मैं यहां रोज़ी-रोटी कमाने आया था, लेकिन खतरनाक बमों और मिसाइलों के हमलों के बीच जान बचाना मुश्किल हो

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए दो दिग्गजों की लड़ाई में क्या तीसरा बाजी मारेगा? छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव सबसे बड़े दावेदार हैं लेकिन इनके बीच एक तीसरा चेहरा भी है

  छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल इसी साल जुलाई में खत्म होने जा रहा है. उन्हें

आपकी जेब पर कैसे चोट लगा सकती है ईरान की जंग? अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले ने वैश्विक तेल बाजार में खलबली मचा दी है. भारत के लिए यह न केवल महंगाई का खतरा है, बल्कि खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस और व्यापार के लिए भी बड़ी चुनौती है

  अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग से भारत की बेचैनी बढ़ गई है. भारत का नफा-नुकसान इस

लंबी रेस का पक्का फॉर्मूला सुधार की महत्वाकांक्षा और राजकोषीय विकल्पों से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, नौकरियों और निवेशकों के विश्वास तक बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे इकोनॉमिस्ट्स (बाइट) ने 1 फरवरी को पेश केंद्रीय बजट के वादों का व्यापक विश्लेषण किया है.

  प्र. आपकी राय में बजट में फोकस वाले तीन सबसे बड़े क्षेत्र कौन से हैं? ● नीलकंठ मिश्र: पहला और सबसे

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x