आज के दौर में, जहां गुस्सा तुरंत फूटता है और बारीकियों पर शक किया जाता है, सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने एक ऐसी बात कही है जो शायद आज के फैशन के मुताबिक न लगे: ‘रोमांटिक रिश्तों में सावधान रहें.’
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां ने हाल ही में युवाओं को आगाह किया कि वे शादी से पहले के यौन संबंधों में पार्टनर पर आंख मूंदकर भरोसा न करें. खासकर उन मामलों में जहां शादी न होने पर ये रिश्ते बाद में रेप के आरोपों में बदल जाते हैं.
इस पर प्रतिक्रिया बहुत तेज थी. आलोचकों ने इन टिप्पणियों को दकियानूसी, नैतिकतावादी और पितृसत्तात्मक करार दिया. लेकिन, जैसा कि दूसरे लोग तर्क देंगे, अगर आप वैचारिक विरोध को हटाकर देखें, तो जो बचता है वह एक गहरी व्यावहारिक चेतावनी है, जो अदालतों में बढ़ रहे एक खास पैटर्न पर आधारित है. जज ब्रह्मचर्य पर प्रवचन नहीं दे रहे थे, वे एक कानूनी ‘बारूदी सुरंग’ की ओर इशारा कर रहे थे.
‘टूटे वादे’ पर कानूनी कार्रवाई
भारतीय अदालतें सालों से इस उलझे हुए सवाल से जूझ रही हैं: शादी के वादे पर बनी सहमति वाली नजदीकी कब ‘रेप’ बन जाती है? एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने एक डॉक्टर को रेप का दोषी माना था क्योंकि उसने उस महिला से शादी करने का वादा तोड़ दिया था जिसके साथ उसके सहमति से संबंध थे. कोर्ट का तर्क था कि महिला की सहमति ‘धोखे’ पर आधारित थी, इसलिए वह मान्य नहीं थी.
लेकिन कई अन्य मामलों में, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी पुरुषों को राहत या जमानत दी है. कोर्ट ने गौर किया है कि सहमति वाला रिश्ता जो बाद में टूट जाता है, वह अपने आप में रेप नहीं हो जाता. कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एक ‘ईमानदार’ लेकिन अंततः टूटा हुआ वादा ‘आपराधिक धोखे’ के बराबर नहीं हो सकता.
प्रेमियों को लग सकता है कि वे शादी करेंगे, लेकिन बाद में उन्हें पता चलता है कि वे एक-दूसरे के लिए सही नहीं हैं. शुरुआत से किए गए ‘झूठे वादे’ और एक ‘ईमानदार रिश्ते जो नाकाम हो गया’ के बीच का यह फर्क साबित करना सबसे मुश्किल काम है.
नया कानून: भारतीय न्याय संहिता
भारतीय न्याय संहिता ने इस धुंधले क्षेत्र को स्पष्ट करने की कोशिश की है. अब धारा 69 के तहत “छलपूर्ण साधनों” (deceitful means) से बनाए गए यौन संबंधों को, जिसमें शादी का ऐसा झूठा वादा शामिल है जिसे पूरा करने का इरादा न हो, एक विशेष अपराध माना गया है. इसके लिए 10 साल तक की जेल की सजा हो सकती है. खास बात यह है कि इसे पारंपरिक ‘रेप’ की श्रेणी से अलग रखा गया है. यह कानून ‘धोखे’ को पहचानता है, सिर्फ भावनात्मक निराशा को नहीं.








