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कौन हैं विनोद जाखड़ जिन्हें कांग्रेस ने NSUI का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है? कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI के अब तक के इतिहास में पहली बार राजस्थान के किसी युवा नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है

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भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के 55 साल के इतिहास में यह पहला अवसर है जब राजस्थान के किसी युवा नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है. अब तक राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे विनोद जाखड़ को संगठन में शीर्ष स्थान मिला है. उन्होंने वरुण चौधरी का स्थान लिया है. यह नियुक्ति केवल एक संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि कांग्रेस की बदलती राजनीतिक रणनीति का स्पष्ट संकेत है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और NSUI के AICC प्रभारी कन्हैया कुमार ने इस पद के लिए देश भर से आए 15 उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया था. ग्रुप डिस्कशन के माध्यम से इन छात्र नेताओं की वैचारिक स्पष्टता और काबिलियत को परखा गया. इस दौरान राहुल गांधी ने देश के मौजूदा हालात, राजनीति और कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े कड़े सवाल पूछे, जिनमें विनोद जाखड़ अपनी प्रतिभा और बेबाकी के दम पर बाजी मारने में सफल रहे.

जाखड़ की इस नियुक्ति का ‘टर्निंग पॉइंट’ 30 सितंबर 2025 को राजस्थान यूनिवर्सिटी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शस्त्र पूजन कार्यक्रम का कड़ा विरोध करना रहा. उस दौरान संघ और NSUI कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद विनोद जाखड़ सहित करीब एक दर्जन नेताओं को गिरफ्तार किया गया था. जाखड़ को 17 दिन जेल में बिताने पड़े. उस समय सचिन पायलट उनसे जेल में मिलने पहुंचे थे, हालांकि प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना ने जाखड़ की छवि एक प्रखर संघ विरोधी और आक्रामक युवा नेता के रूप में स्थापित कर दी, जिससे वे राहुल गांधी की पसंद बन गए. साक्षात्कार के दौरान उनके इसी संघर्षशील तेवर का उन्हें बड़ा लाभ मिला.

मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के ‘यूथ विजन’ के साथ-साथ जाखड़ कांग्रेस के वर्तमान सामाजिक समीकरणों में भी पूरी तरह फिट बैठते हैं. पिछले कुछ समय से राहुल गांधी अपनी राजनीति में दलित और ओबीसी समाज की भागीदारी पर विशेष जोर दे रहे हैं और विनोद जाखड़ इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही, जिसके कारण 2024 में उन्हें राजस्थान NSUI का अध्यक्ष बनाया गया था. इसके अतिरिक्त, राजस्थान में नशे के खिलाफ उनके द्वारा चलाए गए अभियान ने भी उन्हें संगठन में एक विशिष्ट पहचान दिलाई.

जयपुर जिले की विराटनगर तहसील के मेढ़ गांव में जन्मे विनोद जाखड़ का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है. उनका परिवार करीब 25 साल पहले रोजगार की तलाश में जयपुर आया था. उनके पिता पूरणमल एक राजमिस्त्री थे, जिन्होंने 2001 में जयपुर के एक निजी स्कूल में निर्माण कार्य किया और बाद में उसी स्कूल में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं. जाखड़ की शुरुआती शिक्षा भी उसी स्कूल में हुई. बाद में राजस्थान यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए वे छात्र राजनीति की मुख्यधारा से जुड़े. साल 2014-15 में वे राजस्थान कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष बने. 2018 के विश्वविद्यालय चुनावों में जब NSUI ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत दर्ज की.

राजनीतिक निष्ठा के मामले में जाखड़ को सचिन पायलट गुट का बेहद करीबी माना जाता है. 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद जब राजस्थान में सत्ता संघर्ष की स्थिति बनी, तब भी जाखड़ मजबूती से पायलट के साथ खड़े रहे. हालांकि, इसी कारण उन्हें मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा. माना जा रहा है कि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले सचिन पायलट राज्य में एक नया और मजबूत युवा नेतृत्व तैयार कर रहे हैं. इसके साथ ही जाखड़ के कन्हैया कुमार से भी प्रगाढ़ संबंध हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर उनकी राह आसान करने में सहायक रहे.

अपनी आक्रामक शैली के कारण जाखड़ कभी-कभी विवादों में भी रहे. हाल ही में 22 जनवरी 2026 को राजस्थान प्रभारी ने उन्हें अनुशासन भंग करने और बिना अनुमति नियुक्तियां करने पर नोटिस भी जारी किया था, लेकिन कन्हैया कुमार से उनकी नजदीकी ने उनकी स्थिति को कमजोर नहीं होने दिया. जाखड़ की नियुक्ति से कांग्रेस ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं- पहला, एक दलित चेहरे को राष्ट्रीय मंच देकर अनुसूचित जाति के वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, और दूसरा, इसके जरिए सचिन पायलट का राजनीतिक कद भी बढ़ाया गया है.

निश्चित रूप से विनोद जाखड़ की भूमिका अब केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहेगी. इसका प्रभाव 2028 के राजस्थान चुनाव और भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा. उनके सामने अब दोहरी चुनौती है: देशभर में निष्क्रिय पड़ी NSUI इकाइयों में नई जान फूंकना और कांग्रेस की युवा राजनीति को जमीनी स्तर पर वैचारिक रूप से मजबूत करना. अब देखना यह होगा कि क्या विनोद जाखड़ अपनी जुझारू छवि को एक कुशल संगठनात्मक शक्ति में बदल पाते हैं या राष्ट्रीय राजनीति की पेचीदगियां उनके लिए एक कठिन परीक्षा साबित होंगी.


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