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बनारस में ‘मसान की होली’ पर क्यों शुरू हुआ आस्था, शास्त्र और राजनीति का टकराव? वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म से खेली जाने वाली मसान की होली पर डोमराजा परिवार और विद्वत परिषद आमने-सामने हैं

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वाराणसी, काशी और बनारस के अलग-अलग नाम वाला यह प्राचीन शहर अपने विरोधाभासों के कारण भी दुनिया भर में अलग पहचान रखता है. यहां जहां देवस्थानों की घंटियां बजती हैं, वहीं गंगा किनारे महाश्मशान में चिताएं लगातार जलती रहती हैं. इसी शहर में जीवन और मृत्यु को एक ही धारा के दो किनारे माना जाता है.

इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में “मसान की होली” जैसी परंपरा ने जन्म लिया और पिछले डेढ़ दशक में वैश्विक पहचान भी पाई. लेकिन इस बार यह आयोजन गंभीर विवाद के केंद्र में है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह परंपरा सच में प्राचीन है या हाल के वर्षों में गढ़ी गई एक धार्मिक प्रस्तुति. क्या इसे रोकने की मांग आस्था की रक्षा है या किसी और राजनीति का हिस्सा.

“मसान” मतलब होता है श्मसान. काशी का मणिकर्णिका घाट ऐसा श्मशान है जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां चिता की राख कभी ठंडी नहीं होती. मतलब चौबीसों घंटे यहां चिताएं जलती रहती हैं. इन्हीं जलती चिताओं की राख से कुछ लोग होली खेलते हैं. इसी होली को मसान की होली कहते हैं. मसान की होली हर साल फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है. यह दिन रंगभरी एकादशी के अगले दिन आता है. यानी इस वर्ष रंगभरी एकदशी 27 फरवरी को है और इसके अगले दिन 28 फरवरी को वाराणसी में मसान की होली खेली जाएगी.

मान्यता है कि इस अवसर पर भगवान शिव भस्मांगरागाय महेश्वर रूप में अपने गणों के साथ चिता भस्म से फाग रचाते हैं. दोपहर के समय महाश्मशान में राग-रागिनियों के बीच चिताओं की राख से होली खेली जाती है. साधु-संत, नागा और अघोरी परंपरा से जुड़े लोग इसमें भाग लेते हैं. पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, देश-विदेश से आए पर्यटक और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर भी इसमें शामिल होने लगे हैं.

आयोजन से जुड़े गुलशन कपूर का दावा है कि यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है और मुगल काल में बाधित होने के बाद पुनर्जीवित हुई. उनका कहना है कि काशी स्वयं महाश्मशान है और यहां मृत्यु उत्सव का रूप लेती है. उनके मुताबिक, शिव के गणों के साथ भस्म की होली खेलने की कथा पुराणों में मिलती है और उसी भाव को जीवित रखने के लिए यह आयोजन होता है.

वर्ष 2009 के आसपास इसे संगठित रूप में शुरू किया गया और मीडिया कवरेज के बाद इसकी पहचान तेजी से बढ़ी. आज यह काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक छवि का हिस्सा बन चुका है. लेकिन इसी दावे को लेकर सबसे बड़ा विवाद खड़ा हुआ है. श्रीकाशी विद्वत परिषद और कुछ अन्य धार्मिक संगठनों का कहना है कि शास्त्रों में श्मशान को उत्सव का स्थल नहीं माना गया है.

परिषद से जुड़े विद्वानों का तर्क है कि श्मशान वैराग्य और अंतिम संस्कार का स्थान है, न कि सार्वजनिक आयोजन का मंच. उनका कहना है कि महिलाओं और बच्चों के श्मशान जाने पर पारंपरिक मर्यादाएं हैं, जबकि मसान की होली में बड़ी संख्या में युवतियां और नाबालिग भी पहुंच रहे हैं. जलती चिताओं के बीच नाच-गाना, फोटोशूट और रील बनाना मृतकों के परिजनों की संवेदनाओं को आहत करता है.

विवाद तब और भड़क गया जब डोमराजा परिवार ने इस परंपरा पर रोक लगाने की मांग की. मणिकर्णिका घाट के पारंपरिक संरक्षक माने जाने वाले डोमराजा परिवार के प्रतिनिधि विश्वनाथ चौधरी ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर कहा कि इस आयोजन का कोई स्पष्ट शास्त्रीय आधार नहीं है. उनका आरोप है कि पहले यह कार्यक्रम मसाननाथ मंदिर तक सीमित था, लेकिन अब इसका दायरा इतना बढ़ गया है कि श्मशान की गरिमा प्रभावित हो रही है. उन्होंने शराब के सेवन, हुड़दंग और शवदाह में बाधा जैसे आरोप भी लगाए.

मणिकर्णिका घाट पर मसान होली (फाइल फोटो)
मणिकर्णिका घाट पर मसान होली (फाइल फोटो)

डोम समुदाय का विरोध सिर्फ धार्मिक तर्कों तक सीमित नहीं है. मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की परंपरा सदियों से डोम समुदाय के हाथ में रही है. श्मशान की व्यवस्था, अग्नि की निरंतरता और संस्कार की प्रक्रिया में उनकी केंद्रीय भूमिका है. ऐसे में जब घाट एक बड़े सार्वजनिक आयोजन का मंच बनता है, तो उनके अधिकार और नियंत्रण के प्रश्न भी उठते हैं. स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह विवाद आस्था और मर्यादा से आगे बढ़कर अधिकार क्षेत्र और प्रभाव की लड़ाई भी है.

दूसरी ओर आयोजक पक्ष इसे काशी की आत्मा पर हमला बता रहा है. गुलशन कपूर ने विरोध करने वालों को बाहरी और चंदे की राजनीति करने वाला तक कह दिया. उनका आरोप है कि कुछ लोग इस आयोजन की लोकप्रियता से असहज हैं. उनका कहना है कि जब यह कार्यक्रम छोटा था तब किसी को आपत्ति नहीं थी, लेकिन जैसे ही इसे मीडिया और पर्यटन का ध्यान मिला, विरोध शुरू हो गया. उनके मुताबिक काशी में कई संगठन खुद को विद्वत परिषद बताते हैं और धार्मिक प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं, जबकि परंपरा का असली स्वरूप घाटों और लोकजीवन में बसता है.

यहां राजनीति का पहलू भी साफ दिखता है. काशी देश की सांस्कृतिक राजधानी मानी जाती है और यहां होने वाला हर आयोजन प्रतीकात्मक महत्व रखता है. पिछले एक दशक में धार्मिक आयोजनों को बड़े पैमाने पर ब्रांडिंग और पर्यटन से जोड़ा गया है; गंगा घाटों के सौंदर्यीकरण से लेकर उत्सवों के आयोजन तक, सब कुछ एक व्यापक सांस्कृतिक प्रस्तुति का हिस्सा बना है. ऐसे में मसान की होली भी आध्यात्मिक आयोजन के साथ पर्यटन आकर्षण बन गई. विदेशी मीडिया और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें वायरल होती हैं. इससे शहर की एक अनोखी पहचान बनती है.

विरोधी पक्ष का कहना है कि यही ब्रांडिंग असली समस्या है. उनके अनुसार श्मशान जैसे संवेदनशील स्थल को तमाशे में बदलना काशी की परंपरा नहीं है. वे यह भी कहते हैं कि जो कथा शिव और उनके गणों की है, वह प्रतीकात्मक है, उसे सार्वजनिक आयोजन का रूप देना शास्त्रसम्मत नहीं. कुछ विद्वान यह भी सवाल उठा रहे हैं कि अगर यह परंपरा चार सौ साल पुरानी है तो उसके ठोस ऐतिहासिक प्रमाण क्यों नहीं मिलते.

आस्था और इतिहास की इस बहस के बीच आम काशीवासी उलझन में हैं. एक बड़ा वर्ग मसान की होली को जीवन और मृत्यु के द्वैत को स्वीकार करने का उत्सव मानता है. उनके लिए यह संदेश है कि मृत्यु अंत नहीं, मुक्ति का द्वार है. चिता की राख से खेलना उस सत्य को स्वीकार करना है जिससे लोग आम तौर पर डरते हैं. काशी में यह भावना गहरी है कि जो यहां मरता है उसे मोक्ष मिलता है. ऐसे में मृत्यु का भय कम करने वाली परंपराएं यहां स्वाभाविक लगती हैं.

मसान की होली की लोकप्रियता के पीछे सांस्कृतिक कारण भी हैं. लोकगायकों और शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों ने शिव और महाश्मशान के भाव को अपने गीतों में पिरोया. इससे यह आयोजन आध्यात्मिक के साथ सांस्कृतिक उत्सव भी बन गया. युवा पीढ़ी इसे अलग तरह की आध्यात्मिकता के रूप में देखती है. सोशल मीडिया पर इसकी छवियां रहस्य, रोमांच और भक्ति का मिश्रण पेश करती हैं. यही वजह है कि हर साल भीड़ बढ़ती जा रही है.

हालांकि भीड़ बढ़ने के साथ अनुशासन का प्रश्न भी गंभीर हुआ है. प्रशासन के सामने चुनौती है कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बाधित न हो और कानून व्यवस्था भी बनी रहे. अगर शराब और हुड़दंग के आरोप सही हैं तो यह धार्मिक आयोजन की साख पर भी सवाल है. कुछ सामाजिक कार्यकर्ता सुझाव दे रहे हैं कि आयोजन को सीमित दायरे में, साधु-संतों तक रखा जाए और आम भीड़ को नियंत्रित किया जाए. इससे परंपरा भी बचेगी और मर्यादा भी.

काशी के जानकार बताते हैं कि इस पूरे विवाद में एक और परत है धार्मिक नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा. काशी में कई परंपराएं समानांतर चलती हैं और अलग-अलग अखाड़े, मठ और संगठन अपने प्रभाव क्षेत्र रखते हैं. मसान की होली जैसी लोकप्रिय घटना धार्मिक प्रतिनिधित्व की राजनीति को भी छूती है. कौन परंपरा का असली संरक्षक है, किसे बोलने का अधिकार है, और किसकी व्याख्या मान्य मानी जाए, ये सवाल अब खुलकर सामने आ रहे हैं.

फिलहाल स्थिति यह है कि रंगभरी एकादशी नजदीक है और उसके अगले दिन होने वाली मसान की होली पर सबकी नजर है. क्या प्रशासन रोक लगाएगा, क्या आयोजन सीमित रूप में होगा, या पहले की तरह खुले तौर पर चलेगा, यह स्पष्ट नहीं. लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने काशी को एक बार फिर उस प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया है जो सदियों से यहां गूंजता रहा है, परंपरा क्या है और उसकी मर्यादा कौन तय करेगा.

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