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BAFTA जीतकर इतिहास बनाने वाली मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ किस बारे में है और कहां देखने को मिलेगी? ‘बूंग’ को BAFTA की चिल्ड्रन एंड फैमिली फिल्म कैटेगरी में बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिला है

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जब बच्चा नींद में मुस्कुराता है तो समझो ईश्वर से बात कर रहा है. मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ में एक जगह यह बात सुनाई देती है. शायद नींद में ही ईश्वर तक पहुंचना मुमकिन होता होगा. चुपचाप. ऐसे ही चुपचाप इस मणिपुरी फिल्म ने इतिहास में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है.

मणिपुर की इस छोटी सी कहानी ने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों में से एक बाफ्टा (British Academy Film Awards) पुरस्कार जीतकर यह कारनामा कर दिखाया है. बूंग को बाफ्टा के चिल्ड्रेन एंड फैमिली फिल्म कैटेगरी में बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिला है.

एक साधारण बच्चे की कहानी कहने वाली इस फिल्म ने जब दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों में से एक BAFTA में जीत दर्ज की, तो यह सिर्फ एक अवॉर्ड नहीं था बल्कि ये भारतीय रीजनल सिनेमा, खासकर पूर्वोत्तर भारत की आवाज़ का वैश्विक मंच पर पहुंचना भी था. ‘बूंग’ इस श्रेणी में BAFTA जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म है. इससे पहले भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान तो मिली थी लेकिन बच्चों और पारिवारिक फिल्मों की इस श्रेणी में भारत की मौजूदगी एक नया और अहम इशारा है.

एक बच्चे की नजर से दुनिया

‘बूंग’ की कहानी सीधी-सादी है और इसी में सिनेमा का जादू छिपा है. फिल्म एक छोटे से मणिपुरी लड़के बूंग की कहानी कहती है जो अपनी मां के साथ रहता है. पिता परिवार से दूर है. कहानी में उसकी मौजूदगी एक रहस्य है. बूंग का सपना बहुत बड़ा नहीं है. वह बस चाहता है कि उसका परिवार पूरा हो जाए. बूंग कि कुल इच्छा इतनी सी है कि उसकी मां खुश रहे. बूंग जब अपनी मां के लिए कोई ऐसा तोहफ़ा सोचता है जो सबसे ज्यादा असरदार और यादगार हो तो उसे पिता याद आते हैं. बूंग अपने दोस्त से बातचीत में यह तय करता है कि अगर पिता को किसी तरह वापस ले आया तो मां यह तोहफ़ा कभी नहीं भूल सकती और हमेशा ख़ुश रहेगी.

बालमन की इसी उम्मीद के साथ बूंग एक यात्रा पर निकलता है. एक सुंदर यात्रा. यह यात्रा भौगोलिक कम और भावनात्मक ज्यादा है. बूंग के सामने एक लंबा रास्ता है. रास्ते में वह दुनिया को समझता है. लोगों से मिलता है और बड़े मासूम तरीकों से अपने डर और भ्रम से जूझता है. यह इस फिल्म की सुंदरता ही है कि इस यात्रा में फिल्म किसी बड़े ड्रामे या चमत्कार की कहानी नहीं कहती. कुदरत के बेहद सुंदर नजारों के बीच यह कहानी एक मासूम सी जिद से होते हुए एक मामूली लेकिन चमत्कारिक मंजिल तक पहुंचती है. बूंग नाम के इस बच्चे के बहाने हमें अनगिनत बच्चों के मन में झांकने का बेशकीमती मौका देती है यह फिल्म.

ईमानदारी का बयान है 

‘बूंग’ की सबसे बड़ी खासियत है उसकी ईमानदारी. फिल्म कहीं भी दर्शकों को भावुक करने की जबरदस्ती नहीं करती. ना तो बैकग्राउंड म्यूजिक का भारी इस्तेमाल है और  ना ही बड़े संवाद. कैमरा चुपचाप किरदारों के साथ चलता है और दर्शक खुद-ब-खुद कहानी में शामिल हो जाता है.

मां और बेटे के रिश्ते को फिल्म बेहद संवेदनशील तरीके से बरतती है. जो बात इस फिल्म को इसी तरह की बाकी फिल्मों से दूर और अलग ले जाकर खड़ा करती है वो है इसकी ‘नॉन प्रीचीनेस’. मतलब कहीं भी संदेश देने के मोड में ना आना. जबकि पूरी फिल्म में इसकी लबालब संभावनाएं हैं. यही वजह है कि कहानी मणिपुर तक सीमित नहीं रहती बल्कि किसी भी देश या किसी भी संस्कृति के दर्शक से जुड़ जाती है.

स्थानीय कलाकारों की असली दुनिया

फिल्म में किसी बड़े स्टार का चेहरा नहीं है. इसके बजाय स्थानीय कलाकार हैं जिनमें मणिपुरी जीवन का अनुभव दिखता है. बच्चे का अभिनय करते गुगुन किबेन कैमरे पर इतने सहज हैं कि ज्यादातर बार लगता ही नहीं कि वे अभिनय कर रहे हैं.

निर्देशन भी उसी सादगी के साथ किया गया है. जबकि डायरेक्टर लक्ष्मीप्रिया देवी इससे पहले तलाश (2012), लक्ष्य (2004) और पीके (2014) जैसे बड़े फिल्म प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं. बावजूद इसके लक्ष्मीप्रिया बेहद कम संसाधनों का इस्तेमाल करती हैं और सादगी बनाए रखती हैं.

BAFTA तक का सफर

‘बूंग’ का अंतरराष्ट्रीय सफर भी उतना ही शांत और असरदार रहा है. दुनिया के कई बड़े फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाए जाने के बाद इस फिल्म को BAFTA में पहचान मिली. पुरस्कार लेते समय निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी ने मणिपुर और वहां के बच्चों के भविष्य की बात की.

OTT और दर्शकों का इंतजार

सितंबर 2025 में फिल्म को भारत में बेहद कम सिनेमाघरों में रिलीज़ किया गया था. हालांकि तब भी इसे आलोचकों और चुनिंदा दर्शकों ने खूब सराहा था. लेकिन जाने क्या वजह रही है कि अभी तक ये फिल्म किसी बड़े OTT प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं है. साल 2025 में ही कुछ समय तक फिल्म ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म मुबी पर मौजूद थी लेकिन अब वहां से भी इसे हटा लिया गया है.

अब इस बड़ी जीत के बाद दर्शकों और आलोचकों को उम्मीद है कि फिल्म बड़े स्तर पर मार्केट और प्रमोट की जाएगी. निश्चित तौर पर निर्माताओं फरहान अख्तर, रितेश सिधवानी और उनके प्रोडक्शन हाउस एक्सेल एंटरटेनमेंट की पूरी कोशिश रहेगी कि अब ‘बूंग’ राष्ट्रीय स्तर पर बड़े दर्शक वर्ग तक जा सके.

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