Home » National News » इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खींची लकीर: अलग धर्म के पार्टनर के साथ ‘Live-in’ में रहना अपराध नहीं कोर्ट ने पुलिस प्रोटेक्शन मांग रही महिलाओं की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यूपी के 2021 वाले धर्मांतरण कानून की हदें तय कर दी हैं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खींची लकीर: अलग धर्म के पार्टनर के साथ ‘Live-in’ में रहना अपराध नहीं कोर्ट ने पुलिस प्रोटेक्शन मांग रही महिलाओं की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यूपी के 2021 वाले धर्मांतरण कानून की हदें तय कर दी हैं

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 अलग-अलग अर्जियों पर एक साथ सुनवाई करते हुए बड़ी बात कही है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर अलग-अलग धर्म के दो बालिग आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, तो यह यूपी के ‘प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन एक्ट, 2021’ के तहत अपराध नहीं माना जाएगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कानून के तहत ‘इंटरफेथ मैरिज’ पर भी कोई रोक नहीं है.

ये 12 मामले उन महिलाओं के थे जिन्होंने धमकी मिलने के बाद पुलिस प्रोटेक्शन मांगी थी. इनमें से 7 मामलों में मुस्लिम महिलाएं हिंदू पुरुषों के साथ रह रही थीं, जबकि बाकी मामलों में हिंदू महिलाएं मुस्लिम पुरुषों के साथ थीं. इन कपल्स ने कोर्ट को बताया कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं क्योंकि उन्होंने दूसरे धर्म के पार्टनर के साथ रहने का फैसला किया है.

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि कोर्ट इन लोगों को ‘धर्म के चश्मे’ से नहीं देख रहा. कोर्ट उन्हें सिर्फ ऐसे दो बालिगों के तौर पर देख रहा है जिन्होंने शांति से एक साथ रहने का फैसला किया है.

बेंच ने एक बहुत ही लॉजिकल बात कही: “अगर कानून दो लोगों को, यहां तक कि सेम-सेक्स कपल्स को भी साथ रहने की इजाजत देता है, तो फिर किसी व्यक्ति, परिवार या सरकार को एक पुरुष और महिला के साथ रहने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए, जो अपनी मर्जी से साथ हैं?”

जस्टिस सिंह ने जोर देकर कहा कि हर नागरिक की जान और आजादी की हिफाजत करना सरकार का संवैधानिक फर्ज है. बेंच ने कहा, “इंसान की जान की कीमत किसी के धार्मिक विश्वास से बहुत ऊपर है. सिर्फ इसलिए कि ये लोग इंटरफेथ रिलेशनशिप में हैं, इनसे इनके मौलिक अधिकार नहीं छीने जा सकते. जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हो सकता.”

कोर्ट ने साफ किया कि अपनी पसंद के पार्टनर के साथ रहना संविधान के आर्टिकल 21 के तहत ‘Right to Life’ (जीने का अधिकार) का हिस्सा है.

सरकार की दलील क्या थी?

सुनवाई के दौरान यूपी सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध किया. सरकारी वकील का तर्क था कि धर्मांतरण कानून के सेक्शन 3 के मुताबिक, सिर्फ शादी ही नहीं बल्कि ‘शादी जैसे रिश्तों’ (यानी लिव-इन) के लिए भी डीएम को पहले से डिक्लेरेशन देना जरूरी है. सरकार ने कहा कि इन कपल्स ने सेक्शन 8 और 9 का पालन नहीं किया, इसलिए इनका रिश्ता गैरकानूनी है और इन्हें सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए.

कोर्ट ने क्या कहा?

लेकिन कोर्ट की मदद कर रहे एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) ने तर्क दिया कि ये लोग बालिग हैं और सिर्फ लिव-इन में रह रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह कानून तभी लागू होगा जब किसी का इरादा ‘धर्म बदलने’ का हो. अगर कोई धर्म बदलना चाहता है, तभी उसे डिक्लेरेशन देने की जरूरत है.

यूपी का 2021 वाला कानून (जो 2024 में और सख्त हुआ है) जबरदस्ती, धोखे या लालच से धर्म बदलने पर रोक लगाता है. इसमें उम्रकैद तक की सजा है और यह बिना वारंट गिरफ्तारी वाला अपराध है.


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