सुबह साढ़े सात बजे मेरठ के शास्त्रीनगर से निकलने वाले आईटी प्रोफेशनल अमित त्यागी के लिए कुछ साल पहले तक दिल्ली पहुंचना रोज़ की जंग था. बस या कार से दो से ढाई घंटे का सफर, जाम का तनाव और समय की अनिश्चितता उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे.
23 फरवरी को अमित ने वही सफर करीब एक घंटे में तय कर लिया. बेगमपुल के पास बने भूमिगत स्टेशन से ट्रेन पकड़ी और और सीधे सराय काले खां उतरकर दफ्तर पहुंच गए. उनके शब्दों में, “अब दिल्ली दूर नहीं लगती.” यही बदलाव राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम के उस प्रोजेक्ट की असली कहानी है, जिसे हम नमो भारत रैपिड रेल के नाम से जानते हैं.
जून 2019 में जब दिल्ली–गाजियाबाद–मेरठ आरआरटीएस कॉरिडोर पर काम शुरू हुआ, तब लक्ष्य साफ था, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सबसे व्यस्त रूट को हाई-स्पीड, समयबद्ध और आधुनिक सार्वजनिक परिवहन से जोड़ना. इस कॉरिडोर को लगभग शून्य से खड़ा करना था. पारंपरिक रेलवे या मेट्रो विस्तार के विपरीत, यहां ट्रैक, स्टेशन, सिग्नलिंग, ब्रिज, सुरंगें- सब कुछ नए सिरे से डिजाइन और निर्मित हुआ.
सात साल तक चला यह निर्माण अभियान तकनीकी, इंजीनियरिंग और लॉजिस्टिक चुनौतियों से भरा रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना की आधारशिला रखी और बाद में प्राथमिक खंड का उद्घाटन भी किया. दुहाई डिपो तक पहली ट्रेनसेट के पहुंचने से लेकर प्राथमिक सेक्शन के संचालन और फिर पूरी लाइन के चरणबद्ध उद्घाटन तक, इसे राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि के रूप में पेश किया गया. सरकार ने इसे ‘न्यू इंडिया’ के इन्फ्रास्ट्रक्चर विज़न से जोड़ा, जहां क्षेत्रीय कनेक्टिविटी आर्थिक विकास का इंजन बनती है. 








