जनवरी 2026 का इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे ऐसे भारत की तस्वीर पेश करता है, जो बदलाव को आत्मविश्वास, बेचैनी और सशर्त भरोसे के साथ साध रहा है. काम, टेक्नोलॉजी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक ताना-बाना, शासन और पर्यावरण से जुड़े सवालों में एक पैटर्न साफ दिखता है. भारतवासी बदलाव के खिलाफ नहीं हैं लेकिन सिस्टम की गड़बड़ियों से जल्दी चिढ़ जाते हैं और जिम्मेदारी तय करने में काफी सटीक हैं.
यह व्यावहारिक सोच रोजगार को लेकर भी दिखती है. इसके केंद्र में नए लेबर कोड हैं, जिनके तहत 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार बड़े ढांचों में समेटा गया: मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा. मकसद था रोजगार को औपचारिक बनाना, अनुपालन का बोझ घटाना और असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा देना. लेकिन इन कोड्स को लेकर शक बना हुआ है.
26.3 फीसद लोग मानते हैं कि इससे मजदूर और उद्योग, दोनों को फायदा होगा. वहीं 23.1 फीसद को लगता है कि यह कारोबार के पक्ष में झुका है. 16.5 फीसद इसे मजदूरों के पक्ष में मानते हैं और 18.1 फीसद के हिसाब से यह पूरी तरह बेअसर है. ठेकेदारी, नौकरी की असुरक्षा और कमजोर शिकायत निवारण व्यवस्था समस्याएं हैं.








