भारत तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है लेकिन वहां से आए शरणार्थियों को अपने धर्म और रीति-रिवाजों के पालन की पूरी आजादी देता है
अब जब चीन ने नाबालिग तिब्बतियों पर बौद्ध मठों में जाने से रोक लगा दी है, इस फैसले पर दुनियाभर का ध्यान जाना तय है. आलोचकों का मानना है कि यह तिब्बत की धार्मिक और सांस्कृतिक आत्मा पर हमले जैसा है. तिब्बती सूत्रों से पता चल रहा है कि इस नियम का सख्ती से पालन हो रहा है. खासकर सर्दियों के मौसम में, जब ज्यादातर परिवार मठों और अन्य पवित्र जगहों पर तीर्थ के लिए जाते हैं.
तिब्बती मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मठों के बाहर सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है, जिनका काम अंदर जाने का प्रयास कर रहे बच्चों और किशोरों को रोकना है, भले ही वे अपने माता-पिता के साथ हों. कहा जा रहा है कि यह एक बड़े राष्ट्रव्यापी सिस्टम का हिस्सा है, जिसके मुताबिक नाबालिगों को धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की पूरी छूट नहीं है. प्रशासन का भी कहना है कि बच्चों को धार्मिक प्रभाव से दूर रखना अनिवार्य है, जिससे उनकी शिक्षा और राजनीतिक चुनाव स्टेट पॉलिसी के अनुकूल हों.
भारत पर इसके असर सिर्फ मानवीय ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और सामाजिक-राजनीतिक होंगे. भारत निर्वासित तिब्बतियों की एक बड़ी जनसंख्या को शरण देता है, खासकर हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों में. धर्मशाला (हिमाचल) और बैलाकुप्पे (कर्नाटक) में तो विदेशों में बसे तिब्बती भी बड़ी संख्या में आते हैं. वजह न सिर्फ तिब्बती बौद्ध शिक्षा लेना है, बल्कि यह डर भी है कि तिब्बत में अब तमाम बौद्ध परम्पराएं विलुप्त होने का खतरा झेल रही हैं जबकि भारत ने उन्हें बचाकर रखा है.
तिब्बती बौद्ध धर्म के सर्वोच्च गुरु दलाई लामा 1959 से धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं. भारत आधिकारिक रूप से तिब्बत ऑटोनॉमस क्षेत्र को चीन गणराज्य का हिस्सा मानता है, पर साथ ही तिब्बती प्रवासी समुदाय को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को बचाने-बढ़ाने करने की अनुमति भी देता है. इसी दोहरी रणनीति के चलते ही भारत लंबे समय से सावधानी के साथ संतुलन बनाकर रख सका है.








